इस्लामी जगत के तीन प्रमुख राष्ट्रों—पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की—ने एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। मक्का में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान इस दूरगामी समझौते को अंतिम रूप दिया गया। इस नए सैन्य व रणनीतिक गठबंधन के अस्तित्व में आने से मध्य पूर्व की राजनीति और वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
इस रक्षा समझौते की सबसे मुख्य विशेषता इसका सामूहिक सुरक्षा ढांचा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, संधि में स्पष्ट किया गया है कि यदि तीनों में से किसी भी एक देश पर बाहरी आक्रमण होता है, तो उसे तीनों राष्ट्रों पर हमला माना जाएगा। यह प्रावधान पश्चिमी सैन्य संगठन 'नाटो' के अनुच्छेद-5 की तर्ज पर बनाया गया है, जिसका उद्देश्य रक्षा उत्पादन, खुफिया जानकारी साझा करने और सैन्य तैयारियों में परस्पर समन्वय को मजबूती देना है।
समझौते के बाद अरब जगत के मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक तरफ जहां इसे क्षेत्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने वाला कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मिस्र जैसे प्रभावशाली अरब देश की इस गठबंधन में गैर-मौजूदगी पर भी सवाल उठ रहे हैं। मध्य पूर्व के शक्ति संतुलन में मिस्र की निर्णायक भूमिका को देखते हुए विश्लेषक इस दूरी को नए कूटनीतिक समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं।
इस समझौते के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता: किसी भी सदस्य राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती मिलने पर तीनों देश एकजुट होकर प्रतिक्रिया देंगे।
- सैन्य व आर्थिक संसाधनों का मेल: तुर्की की अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकी, पाकिस्तान की परमाणु क्षमता व सैन्य शक्ति तथा सऊदी अरब के आर्थिक संसाधनों का एक मंच पर संयोजन।
- भू-राजनीतिक प्रभाव: दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के राजनीतिक परिदृश्य पर इसका व्यापक असर पड़ेगा।
स्रोत: द जीकेपी टाइम्स

